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सोमवार, 22 मई 2017
रविवार, 21 मई 2017
आसक्ति और प्रेम ......
आज रविवार है,फुरसत में सोचा कुछ लिखा जाये वो भी परम्परागत विषय से भिन्न,मन की बात तो विषय था
आसक्ति और प्रेम ......
परिपाटी ये है कि दो लोगों का पहले परिचय होता है,परिचय धीरे-धीरे घनिष्ठता में तब्दील होता है,फिर सम्बन्धों में प्रगाढ़ता आती है,एक अपनापन के भाव उमड़ते है और फिर प्रेम प्रस्फुटित होता है, ऐसा सुना है और अनुभव से महसूस किया है । पर किसी से मिलते है उस से लगाव हो जायें, उस से बात करने का,उस को देखने का,उस से मिलने का मन होने लगे तो क्या ये प्रेम है........ नहीं दरअसल ये आसक्ति या मोह है । आसक्ति का अर्थ है किसी वस्तु के प्रति विशेष रुचि होना। आसक्ति के कारण हम विषयों के अधीन हो जाते हैं। एक दीवानापन,एक मोह,एक सूफियाना अंदाज आसक्ति का पर्याय है। जब हमें किसी से आसक्ति हो जाती है,तब हम उसके बिना रह नहीं पाते है। आसक्ति में अधिकार भाव रहता है। वह व्यक्ति हमारी चेतना का,व्यक्तित्व का हिस्सा बन जाता है जैसे प्रेमी,अपनी प्रेमिका से आसक्ति का भाव रखता है । मेरी समझ में रूकमणी का कृष्ण के साथ प्रेम है और राधा की कृष्ण के प्रति आसक्ति है। पति और पत्नी के बीच प्रेम होता है,आसक्ति की सम्भावना थोड़ी कम ही होती हैै पर एक प्रेमी और प्रेमिका के बीच आसक्ति की सम्भावना अधिक होती है संभव है ये आसक्ति बाद में प्रेम में तब्दील हो जायें । हम अक्सर आसक्ति को प्रेम समझ बैठते है,जबकि सच्चाई यह है कि आसक्ति अलग है और प्रेम अलग ........प्रेम अनेक भावनाओं का, रवैयों का मिश्रण है जो पारस्परिक स्नेह से लेकर खुशी की ओर विस्तारित है। ये एक मजबूत आकर्षण और निजी जुड़ाव की भावना है। आसक्ति से प्रेम उदित हो सकता है और प्रेम में आसक्ति का जन्म भी हो जाता है फिर भिन्नता क्या है आसक्ति और प्रेम में ......कठिन विषय है किन्तु गीता में बार बार कहा गया है -अनासक्त होकर कर्म करें। ‘‘तस्मात असक्तः सततं।। ’’ सदैव आसक्ति से मुक्त रहो। ‘‘संगं त्यक्त्वा धनंजय’’ हे धनंजय! आसक्ति का त्याग कर। ‘‘कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगं असक्तः स विशिष्यते ’’ कर्मेन्द्रियों में आसक्ति ना होना ही कर्म को कर्मयोग बनाता है। ‘‘मुक्तसंगः’’ आसक्ति से जो मुक्त है वह सात्विक कर्ता है। आदि अनेक स्थानों पर इस आसक्ति से दूूर रहने की सलाह दी गई है। पर मन में सदा ये प्रश्न आता है क्या अनासक्त होना सम्भव है। मनुष्य है तो भावनायें भी होंगी ही। कठिन विषय का चुनाव कर लिया आज ............................. अनिल नेमा
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